ख़ामोशी :- अल्फाज़ मेरे

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मेरी ख़ामोशी मेरी ताकत है
कमजोरी इसे, मेरी समझने की भूल मत करना।।

मायने है मेरे शब्दों के, कभी इसलिए भी चुप हूँ
शब्द ही नहीं मेरे पास, ये समझने की भूल मत करना ।।

मेरी ख़ामोशी मेरी समझदारी है
नासमझी इसे,मेरी समझने की भूल मत करना।।

आघात नहीं  पहुँचाना चाहती कुछ लोगो को, कभी इसलिए भी चुप हूँ
ख़ामोशी चुनाव है मेरी ,विवशता मेरी इसे समझने की भूल मत करना  ।।

जुबान से निकले शब्द वापस नहीं लिए जा सकते, कभी इसलिए भी चुप हूँ
वाचाल हूँ, ये समझने की भूल न कर जाओ , कभी इसलिए भी चुप हूँ  ।।

ख़ामोशी लफ्जों पे है, अंतर्मन्न चीखती है मेरी
मुलाकात हो इस भीड़ में  ख़ामोशी पढने वाले लोगों से, कभी इसलिए भी चुप हूँ ।।

ख़ामोशी पहचान है मेरी, जिसे खोना नहीं चाहती, कभी इसलिए भी चुप हूँ
वरना देखे है मैंने बहुतों को, जिनकी वाचालता उन्हें मशहूर करती है, नहीं चाहिए ऐसी कोई उपाधि , कभी इसलिए भी चुप हूँ ।।

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30 thoughts on “ख़ामोशी :- अल्फाज़ मेरे

  1. Raj Gopal S Verma says:

    संजीदा से कुछ अहसास,
    बदल जाते हैं लफ्जों में जब,
    कलम का रोमांच,
    और कागज़ का साथ,
    कभी बूंदों में ढूंढता है कुछ,
    कभी दरिया के बहाव में,
    यादों का फलसफा,
    और रूहानी मुहब्बत,
    सब कुछ तो है,
    उस मसरूफियत में भी,
    दिल के करीब और
    उसके पास !

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  2. Babu Smit Singh says:

    मिल ही जायेगा कोई न कोई खमौशी पहचानने वाला
    दुनिया की भीड़ मे कोई गुमनाम आवाज सुनने वाला
    न करो फिक्र मगरूर ए रुसवाई का मेरे दोस्त
    बाजारों की भीड़ हो या महफ़िल की शोर,मिल ही जायेगा सन्नाटो को पहचानने वाला

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  3. Imran Ali says:

    ज़िंदगी तुझ से हर इक साँस पे समझौता करूँ
    शौक़ जीने का है मुझ को मगर इतना भी नहीं

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