मासूमियत

चार लड़कों के बाद वो घर की पहली लड़की थी तो वाजिब था दुलारी होना । सब की लाडली पर किसी को तो जान से ज्यादा प्यारी थी ।

वो कहते है सूद से प्यारा मूड होता है, हाँ शायद तभी वो दादी के आँखों का तारा थी । जितना प्यार माँ बाप से ना मिला होगा उतना उसकी दादी से मिलता था। ऐसा लगता था जैसे वो बूढी औरत उसपे जीवन का बचा हुआ प्यार उधेल देना चाहती थी । वक़्त गुजरता गया वो भी बढती गयी । एक नन्ही कली अब धीरे धीरे खिलने लगी उस आंगन में, वातावरण भी काफी साथ दे रहा था ।

देखते ही देखते चार साल की हो गयी, एक बेजुबान जिसकी किलकारी से घर गुंजित हो उठता था अब तो उसकी तोतली जवान से फरमाइश भी निकलने लगी । बड़ा मधुर मालूम होता था उसका स्वर और फरमाइश भी प्यारी होती थी उसकी । कहनियाँ सुनना उनमे से एक थी।

रात के प्रहर जब तक दादी से कहानी ना सुन ले, कहाँ उसकी आँखों में नींद झलकती थी । अनगिनत कहानियाँ सुनने के बाद एक कहानी उसे बेहद ही पसंद आ गयी ।

एक पारस पत्थर की कहानी, जिसके स्पर्श मात्र से मुर्दे भी जीवित हो जाते थे । फिर क्या था उसकी तोतली जुबान से एक ही वाक्य निकला, दादी माँ, मैं भी ये पत्थर ले आऊँगी तुम्हरे लिए । तुम्हे कभी मरने ना दूंगी ।

इतना कह के दोनों मुस्कुरा दिया, फर्क इतना था दादी की मुस्कराहट का कारण उसकी पोती का बचपना था और पोती के मुस्कराहट का कारण की उसकी दादी उससे कभी दूर नहीं होगी ।

उसकी नन्ही दिमाग में ये बात घर कर चुकी थी की दादी ने जो उसे बताया है वो सच है और पारस पत्थर भी अवश्य  ही होगा । सब से कहते फिरती उस पत्थर के बारे में और सब उसके नादानी पे मुस्कुरा देते, उसका विश्वास और भी पक्का हो जाता । ऐसा सोचती हूँ यदि उसे तभी ही बता दिया जाता की ये सब कल्पना मात्र है तो शायद हालात कुछ और होते ।

वो समय भी नजदीक आ गया, जब वो सच्चाई जान जाती पर भगवान को तो कुछ और ही मंजूर था ।

एक दिन अचानक दादी की तबियत बहुत बिगड़ गयी, अस्पातल ले जाना पड़ा । बच्ची को ले जाना उचित न समझा गया, दादी को पुरे घर में खोज रही थी तब माँ ने बताया दादी की तबियत थोड़ी बिगड़ गयी है इसलिए चिकित्सक के पास गयी है थोड़ी देर में वापस आ जाएगी ।

हाजिरजवाब काफी थी वो,तुरन्त कह दिया क्यों चिकित्सक क्यों, वो पत्थर तो विश्व भर में एक है और वो मेरे पास है । मुझे ले चलो दादी के पास मैं उन्हें तुरंत ठीक कर दूंगी ।

माँ ने बड़ी हैरानी से देखते हुए पूछा,कौन से पत्थर की बात कर रही तू ?

वो माँ को कमरे में ले गयी और एक रंगीन पत्थर दिखाया, वो पारस पत्थर तो न था पर जिस विश्वास से उसने पत्थर को सहेज के रखा था वो उसका प्रेम और विश्वास था उसके दादी के प्रति, बहुत ही अनमोल ।

माँ के आँखों में आँसू थे,बेटी ने आँसू पोछ्ते हुए अपनी लड़खड़ाती जुबान में कहा, ये पथल तो मैं मच्छी वाले घर से लायी हूँ, अचानक माँ को याद आया की हाल ही मैं शीशे वाले वो मछली का घर फुट गया था, उसमे तो कई रंग बिरंगे पत्थर थे और जो पत्थर उसकी बेटी के कल्पना से ज्यादा मेल खाती होगी उसने वो पत्थर उठा के रख दिया ।

शाम तक जब दादी लौट के नहीं आई, उसने जिद मचा दी दादी से मिलने की, अंततः उसे ले के अस्पताल जाना पड़ा । कमरे में जाते मात्र ही उसने दादी को वो पत्थर दिखाते हुए कह, देखो मैं क्या लायी हूँ और उस पोती के चेहरे में दादी को बीतीं बातें दिखनी लगी, बहुत ही सुकून मिला होगा शायद तभी तो अब तक जो चिकित्सक बता रहे थे की रक्तचाप बहुत ही बढ़ा हुआ है, दवा भी असर नहीं कर  रहे वो ही चिकित्सक ने कहा शायद अब दवाओं का असर शुरू हो गया है ।

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21 thoughts on “मासूमियत

  1. swamiyesudas says:

    बहुत सुन्दर और बहुत खूब, महिमा! …मैं इसे न केवेल मासूमियत, बल्कि विशवास भी कहूँगा! …काश, यही विशवास हममे भी होता! …क्यों भूल जातें हैं हम बचपन के दिन? 😦

    बधाई एवं प्यार. और लिखो! 🙂

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  2. Dheeraj Dave says:

    महिमा हिंदी में लिखना बहुत अच्छा लगता है,अच्छा लगा तुम भी WordPress pe हिंदी का परचम लहर रही हो।

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