दहन

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माँ सर्वप्रथम तुझे मेरा नमस्कार हैं,
हैं रूप तेरे अनगिनत, तू क्रोध की मशाल है

ममता की तू मूरत  कभी, कभी पापियों का विनाश हैं,
सुशोभित है पुष्पों से कभी, कभी गले में मुंडों का हार हैं

जननी है तू जग की, सुकर्मियों का तुझसे ही बचाव हैं,
शैलाब हैं माँ तुझसे ही, तुझसे ही जग में  ठहराव हैं

सर्वदा मस्तक झुकाते तेरे चरणों में सब,
रहता ये सवाल सदा ही मन में, तेरी दृष्टी पड़ेगी कब

माँ तू तो महान है, अच्छे बुरे का तुझे ज्ञान है,
दृष्टी तेरी होती सदा ही, सुकर्मियों को तेरा वरदान हैं

ऋषि-मुनियों को तूने बचाया था, असुरों को तूने ही मार गिराया था,
सुरों ने वरदान तुझसे ही पाया था

एक बार फिर से प्रकट हो जा तू,
इस धरती पे पाप बढ़ रहे बहुत

संरचना इस पृथ्वी की थी तुझसे,
ये पृथ्वी क्या अब भी वैसी ही है, एक बार तो नजर डाल तू

इन्सान के लहजे में अब राक्षसों का वास है,
जुल्मों का हो रहा हर जगह बखान है

बढ़ गए है इस धरती पर पाप बहुत
माँ एक बार फिर अवतार ले तू

नौ रातों तक तेरी पूजा की सबने, दहन किया रावण का भी
परंतु खुद के अंदर के रावण को, जलाना जरुरी समझा नहीं

दहन हो गया जिस रावण का ,उसके दहन का अब क्या फल
जल जाये भीतर का रावण सबमें, माँ दे बस ये वर

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11 thoughts on “दहन

  1. swamiyesudas says:

    Reblogged this on lovehappinessandpeace and commented:
    *******
    You all know that I am a person who is Easily Affected, gets Emotional, and Blabbers.
    Of late, I have been praying:
    “It is Time for Thee, Lord, to Act; For they have made Void Thy Law.”
    The above, a mixture of translations, for which I refuse to apologize, is Psalm. 119:126.

    Mahima Singh, in Beautiful Poetical form, has written these same things, for which I first of all Heartily, Heartily Congratulate her.
    I have taken just a few lines from the End of her poem:
    एक बार फिर से प्रकट हो जा तू,
    इस धरती पे पाप बढ़ रहे बहुत
    बढ़ गए है इस धरती पर पाप बहुत
    माँ एक बार फिर अवतार ले तू
    नौ रातों तक तेरी पूजा की सबने, दहन किया रावण का भी
    परंतु खुद के अंदर के रावण को, जलाना जरुरी समझा नहीं
    दहन हो गया जिस रावण का ,उसके दहन का अब क्या फल
    जल जाये भीतर का रावण सबमें, माँ दे बस ये वर
    Translated (Roughly), they mean:
    “Reveal Yourself once again; sin is Growing in this world, …Incarnate Yourself Once Again,
    For 9 days they all worshipped You*, and burnt the effigy of Raavan**. But the many Raavans they have inside, they Ignored to burn.
    What was/is the Use of burning those Effigies of that Raavan? Give the Grace the Raavans inside Us may get burnt.
    *Referring to the recent festival of Navrathri, more famous in West Bengal, when the deity Durga is worshipped in particular. Deepaavali reminding Us of Ram’s Victory over evil, Navrathri reminds one of Durga’s Victory over the same.
    **Raavan: For me, represents whom I consider a sinner, in having Carried Off another’s Wife, in the person of Sita, wife of Ram.
    *******

    Liked by 1 person

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