बातें :- अनसुनी और अनकही

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क्या तुम मुझे सुन पा रही हो??

वो तुम ही हो न जिसे मैं  अपने तोतले जुबान से  सबसे पहले माँ बोलूंगी, हाँ वहीँ तो हो तुम । तुमने ही तो मुझे आश्रय दे रखा है अपनी कोख में ।

यहाँ बहुत सुरक्षित महसूस करती थी पर अभी अभी जो सुना मैंने, मैं डर गयी ।

वो जो अभी अभी इस कमरे से बाहर निकले शायद वो पिताजी हैं ना, पर वो ऐसा क्यों कह रहे थे उन्हें बेटा चाहिए ।

सुनो न माँ, ये तो मैं हूँ, बेटी तुम दोनों की। माँ तुम दोनों के अंश से ही तो बनी हूँ मैं फिर पिताजी क्यों अपने ही अंश के साथ भेद भाव कर रहे हैं ।

क्या मेरे जन्म से उन्हें ख़ुशी नहीं होगी, मैं तो छोटी सी रहूँगी ना जब इस दुनिया में आऊँगी ।

माँ तुम्हे होश तो रहेगा ना, क्या पता औरों ने मुझे गोद में लेने से इंकार कर दिया तो, तुम्हे होश रहा तो तुम तो कभी इंकार नहीं करोगी ।

पिताजी से कह दो न, वो मेरा स्वागत भी उसी तरह करे जैसे वो सोच रहे हैं, अपने आने वाले बेटे के लिए ।

माँ मेरा दोष तो नहीं है न की मैं बेटी बन के आऊँगी तुम्हारे आंगन में, फिर मुझे कभी सजा भी मत मिलने देना इस बात की ।

पिताजी के बातों से लगता है वो पुराने विचारों के हैं, उन्हें समय के साथ आगे बढ़ने की और नए सोच रखने की जरुरत हैं।

माँ पता है, ये भी हो सकता है पिता जी को लगता होगा बेटियां शायद सुरक्षित नहीं है, पर उन्हें कहना मुझे तुम दोनों के होते डर नहीं हैं और जब मैं बड़ी हो जाऊँगी ना मैं अपने साथ साथ तुम दोनों का भी ध्यान रखूँगी बस अभी तुम मेरा ध्यान रखना ।

माँ उन्हें लक्ष्मीबाई की कहानी सुनाओ ना,बेटी हो के उसने भी तो अपने राज्य के लिए लड़ाई की थी । मैं भी अपनी सुरक्षा के लिए लड़ूंगी ।

माँ मैं जानती हूं , ये दुनिया बहुत ज़ालिम हैं ,हैबनियात  वास करती हैं इंसानो में  पर माँ जहाँ  इंसानियत इस कदर दम तोड़ रही हैं वहाँ इंसानियत के रखवाले भी तो होंगे ना, मैं  सामना कर लूँगी सभी कठिनाइयों  का बस तुम मेरा साथ मत छोड़ना ।

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माँ विज्ञान भी तो बहुत विकास कर गया हैं ना , कहीं ऐसा ना हो विज्ञान का दुरूपयोग हो और मैं जीवन जीने से पहले जीवन खो दूँ ।

माँ तुम ध्यान रखना इन बातों का, मैं अपने वजूद  के लिए तुमपे निर्भर हूँ अभी, आगे चल के मैं अपना खुद का नाम बना लूँगी। ये ही नहीं मैं तुम दोनों को भी नाम रौशन करुँगी पर उससे पहले मुझे एक मौका अवश्य देना ।

मैं तुमलोगों की दुनिया में कदम रखना चाहती हूँ, खुले हवा में सांस लेना चाहती हूँ ।

आज तक तुम्हे महसूस किया हैं, तुम्हे अपनी आँखों से देखना चाहती हूँ । सब लोग मुझे भी देखने को बेचैन होंगे ना, उनसे कहना मैं बस तुम्हारी परछाईं हूँ, उनसे जल्दी ही मिलूंगी ।

माँ मैं तुमसे जितना जुड़ा महसूस करती हूं उतना किसी से नहीं, ये बंधन जीवन भर ऐसा ही बना रहेगा । देखना मैं तुम्हारी रानी बिटिया बन के रहूँगी । पिता जी को भी मेरे ऊपर गर्व महसूस होगा एक दिन ।

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माँ तुम दोनों ही हो मुझे जीवनदान देने वाले , मैं भी जरूरत पड़ने पे आजीवन तुम दोनों की जरूरतें पूरी करुँगी ।

अब तुम आराम करो, मुझे भी आराम मिलेगा ।

जल्दी मिलते है हम तुम सब की दुनिया में तब तक मैं इंतजार करुँगी ।

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41 thoughts on “बातें :- अनसुनी और अनकही

  1. चोर says:

    मैं भी एक ब्लाग चलाता हूँ जहाँ फेसबुक के नामी..बेनामी लेखकों की रचनाएँ प्रकाशित होती है..कृपया एक बार जरूर जाए..पसंद आने पर फौलो करना न भूलें.

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  2. novelistbaba says:

    i have no words…….and no words can be said…….what’s wrong is wrong……
    i am very emotional when it comes to these cruelties……..i could not read the whole thing…..
    but all that i have read……..you write beautifully……..
    god bless our future generations….. 🙂 🙂

    Liked by 2 people

  3. theonlysup says:

    This has been reduced to great extent as doctor now are not allowed to reveal the gender . well what difference does gender make for them I don’t understand.. Beti hui. To kya hua.. Jab maa ko samman dete ho to beti ko kyu nahi ..

    Liked by 1 person

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